कविता ( मैं खुद )
कविता
( मैं खुद )
मैंने मां के आंसूओं को छलकते देखा हैं !
मैंने पिता को दर्द छुपाते देखा हैं !
मैंने भाई की आंखों में सपनों को देखा हैं !
मैंने बहन की उम्मीद को देखा हैं !
मैंने खुद को खुद से लड़ते देखा है !
मैंने खुद को खुद से तड़पते देखा हैं !
मैंने मेरी उम्मीद को खुद से खुद को लगाई हैं !
मैंने दुनिया के तानों को हर बार सहन किया हैं !
मैंने पल पल खुद का अपमान होते देखा हैं !
मैंने अपनों में गैरों को देखा हैं, और गैरों में अपनों को देखा हैं !
मैं ,हताश ,निराश, हर पल हुआ हूं, अगर मैं हारा नहीं हूं !
मैं लड़ूंगा, जीतूंगा ,और अपना मुकाम भी हासिल करूंगा !
मैंने खुद से खुद को वादा किया हैं !
मैंने खुद को तपन की भट्टी में जलाया हैं !
मैंने खुद को खुद से जाना हैं !
मैंने इस दुनिया में खुद को पाया हैं !
मैं अखंड विजेता भी बनूंगा, मैं खंड खंड को जोड़ने वाला भी बनूंगा !
मैं हार तब तक नहीं मानूंगा , जब तक जीतूंगा नहीं !
मैं मेरी इच्छाओं का दामन जोड़ कर रहूंगा!
मैं हर वो सपना पूरा कर लूंगा जो मैंने खुद देखा हैं
लेखक श्रवण कुमार सुथार
Bht achi kavita likhi h.....sach me ankh me ansu aa gye
ReplyDeleteThanks you so much
DeleteWau great
ReplyDeleteMst
ReplyDeleteSuperb
ReplyDeleteBahaut khoob dil ki gaharaai se
ReplyDeleteBilkul shi likha h
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है 👌👌
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